परिचय
June 6, 2025 2025-06-28 14:14परिचय
पूज्य मुनिश्री अजितसागर जी महाराज
जीवन यात्रा
भारत देश मे कई महान आत्माओं में जन्म लिया एक अद्भुत व्यक्तित्व ने छोटे से ग्राम सिमरिया गढ़ाकोटा को धन्य किया वह दिन था १७ अप्रैल १९६८ का। जब माता श्रीमति ताराबाई जी व पिता कोमलचन्द जी के आंगन में एक नन्हे बालक की किलकारियां गूंजी। सबने मिलकर उस हंसमुख बालक का नाम रखा…. विनोद…। जो सबका मनमोहक था।
बालक विनोद द्वितीय सन्तान होकर भी अद्वितीय थे अग्रज बड़े भाई श्री भागचंद जी जैन व अनुज भाई बालचन्द जी जैन थे बड़ी बहिन श्रीमती मालती जैन जी व दो छोटी बहिन श्रीमती ममता जैन जी, श्रीमती राजुल जैन जी परिवार के सदस्य थे बालक विनोद की लौकिक शिक्षा मात्र आठवीं कक्षा हुए। गुरु के पास रहकर किये गए अध्ययन से आप आगम सिद्धांत और न्याय अध्यात्म शास्त्र के ज्ञाता हैं।
तिथि के अनुसार बैशाख कृष्ण पंचमी दिन बुधवार को ब्रह्ममुहुर्त बेला में लगभग रात्रि 4:30 बजे जन्म लेने वाले सागर जिले के बालक विनोद ने महा सागर में डुबकी लगा दी। 19 वर्ष की अल्प आयु में आजीवन ब्रह्मचर्यव्रत 27 दिसम्बर 1987 को क्षेत्रपालजी ललितपुर उत्तरप्रदेश में सन्त शिरोमणि १०८ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से लिया था। गुरु के प्रति अपना जीवन समर्पण कर दिया।
जब विनोद जी के गृहनगर 1986 अतिशय क्षेत्र पटेरिया जी गढ़ाकोटा में परम पूज्य मुनिश्री क्षमासागर जी महाराज व मुनिश्री गुप्तिसागर महाराज जी का चातुर्मास हुआ वैराग्य का कारण मुनि द्वय के प्रभाव से संसार की असारता को समझकर बना। आचार्य श्री की आज्ञा व आशीर्वाद से नवम्बर सन् 1988 में ब्र. विनोद भैया जी का गृहत्याग हुआ।
ब्र. विनोद भैया जी की 15 जून 1989 श्री धर्मनाथ भगवान के मोक्ष कल्याणक के दिन कटनी मध्यप्रदेश में ड्रेस परिवर्तन हुआ और गुरु जी से द्वितीय प्रतिमा व्रतों का संकल्प लिया था। 27 दिसम्बर 1989 सिरोंज मध्यप्रदेश में आचार्यश्री जी के सान्निध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के तपकल्याणक के दिन 20 वर्ष 8 माह 10 दिन की उम्र में प्रथम केशलौंच किये थे। परम पूज्य आचार्य श्री कहते थे कि केशलौंच साधक की साधना, वैराग्य की परीक्षा का पेपर है इसे स्वयं करना चाहिए कराना नहीं चाहिए।
ब्र. विनोद भैया जी का गुरुजी ससंघ सान्निध्य में ब्रह्मचर्य अवस्था का प्रथम चातुर्मास सिद्ध क्षेत्र मुक्तागिरि जी जिला बैतूल मध्यप्रदेश में हुआ था। 10 अक्टूबर से 18 अक्टूबर 1990 तक सिद्ध क्षेत्र मुक्तागिरि जी में परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने नव निर्जला उपवास किये जिस दिन पारणा हुई थी उसी दिन आचार्य श्री जी से ब्र. विनोद भैया जी ने सातवीं प्रतिमा के संकल्प लिया थे।
ब्र. विनोद भैया जी ने ब्रह्मचारी अवस्था में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के साथ में सन् 1990 से 1995 तक चातुर्मास में रहें और आचार्य श्री एवं संघ की सेवा औषधि आदि बनाकर मुनि संघ को चलाना और स्वाध्याय ध्यान करना यही दिन चर्या थी। आपने 1 जनवरी 1993 अष्टमी के दिन जबलपुर मढिया जी में परम पूज्य आचार्य श्री से 10 प्रतिमा के व्रतों का संकल्प लिया था।
सिद्ध क्षेत्र तारंगा जी में आचार्य श्री ससंघ का ग्रीष्म कालीन चल रहा था परम पूज्य आचार्य श्री जी ऊपर गुफा में बैठे थे 12 अप्रैल के ब्रह्मचर्य विनोद भैया जी पूजन करके अर्घ्य चढ़ाकर हाथ में बादाम थी आचार्य श्री जी निवेदन किया मुझे क्षुल्लक दीक्षा लेनी है। आचार्य श्री बोले- अच्छा दीक्षा लेनी है। ब्र. विनोद जी जी आचार्य श्री जी, पर क्षुल्लक दीक्षा लेनी है। आचार्य श्री जी – ऐसा क्यों क्षुल्लक दीक्षा लेनी मुनि दीक्षा नहीं लेनी है। ब्र. विनोद जी अभी तो क्षुल्लक दीक्षा 30 साल के बाद मुनि दीक्षा, फिर आपके ऊपर है। आचार्य श्री जी हंस दिया और कहा भावना भाव, माला फेरों सोचते हैं।
पता चला उस दिन आहार चर्या के बाद ईर्यापथ प्रतिक्रमण के समय पूरे संघ के सामने आचार्य श्री जी ने कहा की आज सुबह ब्रह्मचारी विनोद जी ने क्षुल्लक दीक्षा के लिए निवेदन किया है, और पूरे संघ कहा आचार्य श्री जी सिद्ध क्षेत्र है और इस क्षेत्र ब्र. विनोद जी श्री विद्यासागर तपोवन बनाने, जमीन आदि चयन को आपने भेजा था अच्छा रहेगा दीक्षा कार्यक्रम हो जाना चाहिए। और 14-15 अप्रैल को आचार्य श्री संकेत दे दिए कि 20 अप्रैल अक्षय तृतीया के दिन दीक्षा का कार्यक्रम होगा।
20 अप्रैल 1996 अक्षय तृतीया के दिन सिद्धक्षेत्र तारंगा जी गुजरात मे वस्त्रों का कुछ भार कम हुआ और बन गए क्षुल्लक प्रज्ञासागर जी।
5 जनवरी 1998 सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर जिला देवास में ऐलक प्रज्ञा सागर जी बन गए। मोक्षमार्ग की ओर एक-एक कदम बढ़ गए। इस मनुष्य पर्याय की उत्कृष्ट पर्याय मुनि पद को वैशाख शुक्ल सप्तमी 22 अप्रैल 1999 सिद्धोदय सिद्धक्षेत्र नेमावर जिला देवास आचार्य भगवन के कर कमलों से वर्तमान चौबीसी में द्वितीय स्थान पाया। गुरुदेव के मुखारविंद से नाम घोषित हुआ मुनि श्री अजितसागर महाराज जी। ऐलक प्रज्ञा सागर जी से बने मुनि श्री अजितसागर महाराज जी। मुनि श्री जी की एक विशेषता रही विशेष परिस्थिति को छोड़कर क्षुल्लक अवस्था मे तीन महिने में 20 अप्रैल, मुनिअवस्था में लगभग तीन महीने के बाद 22 तारीख को गुरुदेव केशलोंच करते है। मुनिश्री जी ने आचार्यश्री जी के साथ क्षुल्लक अवस्था के दो चातुर्मास 1996 महुवा जी सूरत, 1997 नेमावर जी, ऐलकअवस्था का एक 1998 भाग्योदयतीर्थ सागर, मुनिअवस्था के तीन 1999 गोम्मटगिरि इन्दौर, 2000 सर्वोदयतीर्थ अमरकंटक, 2001 दयोदयतीर्थ जबलपुर, चातुर्मास किये थे।
गुरुदेव की की कुछ मौलिक कृतियाँ – महाश्रमण, भीतर कहीं, विद्याशती, निगहवान, मुनि मानस, मानस मोती (भाग१, २, ३, ४), परमेष्ठीस्तव, आचार्य श्री विद्यासागर की चेतन कृति, पर्यूष वाणी, धर्म के दस सोपान, श्रमण परम्परा के महाश्रमण, सद्गुरु के प्रसंग बनें जीवन के अंग, विद्या के सागर (कॉमिक्स), श्री विद्यागुरु विधान, सल्लेखना समत्व की साधना, विद्यागुरु के प्रसंग। लेखनी अद्भुत है।
मुनि श्री जी ने कुछ स्त्रोत का अनुवाद कर विधान रूप में लिखा है वह अनुवादित कृतियाँ-तीर्थंकरस्तव, साधना पथ का पाथेय, सामायिक पाठ, एकीभाव स्तोत्र, कल्याण मंदिर स्तोत्र, विषापहार स्तोत्र-पूजन-विधान, भक्तामर स्तोत्र विधान, जिन दर्शनाराधना (दर्शनपाठ)। टीकात्मक कृतियाँ – छहढ़ाला, तत्त्वार्थ सूत्र विद्यावर्द्धनी टीका। नोट – हाईकूँ कविताएँ एवं अनेक शोधपरक आलेख आदि ।
वीरदेशना, अहिंसासूत्र, विद्यावाणी, ज्ञानोदयसार, स्वराज और भारत, भारत की भाषा राष्ट्रीयभाषा हो, ज्ञानप्रभा संकलित कृतियाँ है। परम पूज्य मुनिश्री जी ने परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के संबंध में कृतियां लिखी है – महाश्रमण (ज्ञानोदय छुन्द काव्य रचना), विद्या शती (दोहा शतक), सद्गुरु के प्रसंग बनें जीवन के अंग, विद्या गुरु के प्रसंग (संस्मरण), विद्यासागर जी की चेतन कृति ( संघ परिचय सचित्र) श्रमण परम्परा के महाश्रमण (आचार्य श्री संबंध की जानकारी), विद्या गुरु विधान, विद्या के सागर। इस तरह गुरुदेव ने कई कृतियों का सृजन किया।
घर बैठे स्वाध्याय भी मुनि श्री जी के प्रेरणा से लगभग 2019 से सतत चल रहा है अविजित समूह रजिस्टर्ड संस्था का गठन पूज्य मुनि श्री की प्रेरणा से कई शहरों में हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा, सेवा, स्वास्थ्य…. को लेकर है। ऐसे कुछ नया कार्य करने की ललक मुनि श्री जी मे प्रति समय रहती है।