हम लेकर घृत के दीप, झुकायें शीश तुम्हें मुनिराजा श्री अजितसागर जी महाराजा – 2
तुम नगर गढ़ाकोटा जन्म लियो, माँ तारादेवी को धन्य कियो श्री
कोमलचंद्रजी के हर्षे जिया अपारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
तुम विद्याअध्ययन करते हो, तुम शांत स्वभावी रहते हो
बचपन में था नाम विनोदकुमारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
तुम तीन भाई और तीन बहिन, था नहीं किसी से तुम्हें गहन
सब छोड़ दिया घरबार और परिवारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
तुमरे गुरू विद्यासागर हैं, जो ज्ञान ध्यान में उजागर हैं
तुम्हें दीक्षा देकर बहुत किया उपकारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
ऐसे गुरू विद्यासागर हैं, जो भरते खाली गागर हैं
तुमने नेमावर में भेष दिगम्बर धारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
तुम शांति सुधा बरसाते हो, हम सबके मन को भाते हो
देते प्रवचन मीठा बहुत ही प्यारा, श्री अजितसागरजी महाराजा
हम लेकर घृत के दीप, झुकायें शीश तुम्हें मुनिराजा, श्री अजितसागरजी महाराजा
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