पूज्य मुनिश्री अजितसागर जी महाराज ससंघ श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर खराड़ी, पुणे में विराजमान हैं। **सर्वोदय सम्यग्ज्ञान विद्या शिक्षण शिविर खराड़ी–पुणे दिनांक 13 से 21 मई–2026** *अविजित समूह का ऐप अब प्ले स्टोर पर उपलब्ध है, मोबाइल पर सीधे जुड़ें Avijit samuh सर्च करें और डाउनलोड करें।*

मुनिश्री अजितसागरजी महाराज पूजन

मुनिश्री अजितसागरजी महाराज पूजन

आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज के परम शिष्य
मुनिश्री अजितसागरजी महाराज पूजन

(तर्ज : ऐ मेरे वतन के लोगो…)

श्री अजितसागरजी मुनिवर, स्वीकारो मम अभिनंदन ।
मैं ध्यान धरूं गुरू चरणा, मेटो भव भव की भ्रमणा ।।

गुरू आप परम वैरागी, मैं तव चरणन अनुरागी ।

अतिपुण्य उदय मम आया, गुरु भक्ति उर में जागी ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनिन्द्र अत्र अवतर अवतर संवौषट् आवाह्नंन ।
ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनिन्द्र अत्र तिष्ट ठ:ठः इति स्थापनं।
ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनिन्द्र अत्र ममहृदये सन्निहितो भव भव वषट सन्निधिकरणं ।

भव सागर डूब रहा हूँ, कर्मों से उब गया हूँ ।
भव पार लगादो नैया, चरणों में आन खड़ा हूँ ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।
ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय जन्मजरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामिति स्वाहा।

गुरू बहुत लगाया चंदन न किया गुरू पद वंदन ।
यह भुल हुई है मुझसे मेटो भव-भव का भंजन ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरु तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनम निर्वपामिति स्वाहा।

पद अक्षत को ही पाना, निज को निज रूप बनाना।

अक्षय अखण्ड पद पाने, अक्षत हम लाये चढ़ाने ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।

यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतान निर्वपामिति स्वाहा।

इन्द्रिय सुख को अपनाया । चरणों में आन चढ़ाया ।
इन विषय भोग को भोगा, मैं पुष्प संजोकर लाया ।।

श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पाणि निर्वपामिति स्वाहा।

संसार में अब तक भटका, इस क्षुधा व्यथा के कारण ।

यह क्षुधा मिटा दो गुरूवर, चरू ले चरणों में आया ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरु तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामिति स्वाहा।

अज्ञान तिमिर है छाया, भव कानन में भरमाया ।
यह दीप संजोकर लाया, अंतस में उजाला छाया ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामिति स्वाहा।

मैं स्वयं कर्म का कर्त्ता, मिथ्या भ्रम सारी जड़ता ।
कर्मों की धूप जले तो, भव बंधन सारे हरता ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामिति स्वाहा।

आतम का स्वाद न आया, इन्द्रिय सुख में भरमाया ।
शिव सुख की आशा लेकर, गुरूचरणों में फल लाया ।।

श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फलम निर्वपामिति स्वाहा।

अब तक कई अर्घ बनाये, पर एक नहीं मन भाये ।
गुरू अष्ट द्रव्य हम लाये, चरणों में तेरे आये ।।
श्री अजितसागर मुनिराजा, मेरे उर मांही समाजा ।
यहाँ कोई नहीं सहारा, गुरू तारण तरण जहाजा ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्धं निर्वपामिति स्वाहा।

गुरुवर की जय मालिका, हरे जगत की पीर।
करें समर्पित मन वचन, बने सभी हम वीर ॥

जयमाला

(तर्ज : थोड़ा ध्यान लगा कि गुरूवर दौड़े-दौड़े आयेगे ..)

श्वास बनी है गुरूपूजा, अरू गुरु वचन जय माला है ।
श्रमण संघ त्यागी गण से ही सजती विद्या शाला है ।।
महा हितैषी परम गुरू से आतम बल ये मिल जाये ।
शिक्षा दीक्षा, दिशाबोध पा, हृदय कमल भी खिल जाये ।।

हमें खुशी है कलिकाल में, हमको गुरूवर श्रेष्ठ मिले ।
हम पर गुरू का बरद हस्त है, खुशियाँ हैं गुरू छाँव तले ।।
नगर हमारे गुरू पधारे, बड़ी कृपा हम पर कीनी ।
चरण पड़े गुरू शरण खड़े हैं, भक्ति है भीनी-भीनी ।।

छोटी उम्र में व्रत को लेकर, संयम को स्वीकारा है।
गुरूवर का आशीष मिला, और चमका भाग्य सितारा है ।।
समता को अपनाया तुमने, ममता को ठुकराया है ।
निर्मोही बन मोक्ष मार्ग में, अविरल कदम बढ़ाया है ।।

गुरू की भक्ति प्रभु तक है, और अपनी भक्ति गुरू तक है।
मिलती मुक्ति गुरू आज्ञा से ले जाती ये प्रभु तक है ।।
मुस्काती मुद्रा गुरूवर की, सबको एक सहारा है ।
गुरू खुश हैं तो जग खुश है, अरू खुशियों भरा नजारा है ।।

ये गुरूवर हैं बड़े निराले इनकी चर्या उत्तम हैं ।
इनके नियम हैं बड़े निराले, हमें लगे सर्वोत्तम हैं ।।
ये अरहन्त बनेंगे इक दिन, पूर्ण चांद बन चमकें गे ।
हम भी इनके पथ पर चलकर, सिद्ध शिला में दमकेंगे ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागरजी मुनीन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये जयमाला पूर्ण अर्घम् निर्वपामिति स्वाहा।

पंचेन्द्रिय को जीतने, बने अजित महाराज ।
विद्या गुरु की कृपा से, सफल होय सब काज ॥

॥ इत्यादि आशीर्वाद पुष्पांजलि  क्षिपेत।।