पूज्य मुनिश्री अजितसागर जी महाराज ससंघ श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर खराड़ी, पुणे में विराजमान हैं। **सर्वोदय सम्यग्ज्ञान विद्या शिक्षण शिविर खराड़ी–पुणे दिनांक 13 से 21 मई–2026** *अविजित समूह का ऐप अब प्ले स्टोर पर उपलब्ध है, मोबाइल पर सीधे जुड़ें Avijit samuh सर्च करें और डाउनलोड करें।*

आचार्य भक्ति

आचार्य भक्ति

श्री सिद्ध भक्ति

अथ पौर्वाह्निक (आपराह्निक) आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, सकल -कर्म-क्षयार्थ, भाव-पूजा वन्दना स्तव समेतं श्री सिद्ध भक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम् । (नौ बार णमोकार मंत्र का जाप)

सम्मत्त-णाण-दंसण-वीरिय सुहुमं तहेव अवगहणं । अगुरू – लघु-मव्वावाहं अट्ठगुणा होति सिद्धाणं ।। 1।।

तव सिद्धे णय-सिद्धे संजम सिद्धे चरित्त- सिद्धे य। णाणम्मि द सणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमंसामि ।।2।।

इच्छामि भंते ! सिद्ध भत्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं, सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचरित्त-जुत्ताणं, अट्ठविह-कम्म विप्पमुक्काणं, अट्ठ- गुण संपण्णाणं, उड्ढलोय-मत्थयम्मि पयट्ठियाणं, तव-सिद्धाणं, णय-सिद्धाणं, संजम-सिद्धाणं, चरित्त-सिद्धाणं, अतीदा-णागद, वट्टमाण-कालत्तय-सिद्धाणं, सव्व सिद्धाणं, णिचकालं अंचेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमंसामि दुक्खक्खओ, कम्म-क्खओ, बोहिलाहो, सुगई-गमणं समाहिमरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।

श्री श्रुत भक्ति

अथ पौर्वाह्निक (आपराह्निक) आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वा-चार्यानुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थ, भाव-पूजा वन्दना स्तव समेतं श्री श्रुतभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम्। (नौ बार णमोकार मंत्र का जाप)

कोटीशतं द्वादश चैव कोट्यो, लक्षाण्यशीतिस्त्र्यधिकानि चैव । पंचाशदष्टौ च सहस्त्रसंख्य मेतच्छुतं पंचपदं नमामि ।। 1 ।।

देवहिं गंथियं सम्मं । अरहंत -भासियत्थं गणहर -पणमामि भत्तिजुत्तो सुद णाण महोवहिं सिरसा ।। 2 ।।

इच्छामि भंते ! सुद भत्ति काउस्सग्गो कओ, तस्सालोचेउं, अंगोवंग पइण्णय पाहुड्य-परियम्म-सुत्त पढमामिओग-पुव्वगय-चूलिया चेव सुत्तत्थय थुई-धम्म-कहाइयं णिच्चकालं अंचेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमंसामि, दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ, बोहिलाहो सुगई-गमणं, समाहि-मरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।

श्री आचार्य भक्ति

अथ पौर्वाहिक आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वा-चार्यानुक्रमेण, सकल-कर्म-क्षयार्थ, भाव-पूजा-वन्दना-स्तव समेतं श्री आचार्य भक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम् । (नौ बार णमोकार मंत्र का जाप)

श्रुत-जलधि-पारगेभ्यः, स्वपरमतविभावना-पटु-मतिभ्यः । सुचरित-तपो-निधिभ्यो, नमो गुरुभ्यो गुण गुरुभ्यः ।।1।।

छत्तीस-गुण-समग्गे, पंच-विहाचार करण-संदरिसे । सिस्साणुग्गह-कुसले धम्माइरिए सदा वंदे ।।2।।

गुरु-भत्ति संजमेण य, तरंति संसार-सायरं घोरम् । छिण्णंति अट्ठ-कम्मं, जम्मण-मरणं ण पावेंति ।॥3॥

ये नित्यं व्रत-मंत्र-होम-निरता, ध्यानाग्नि होत्राकुलाः, षट्‌कर्माभि – रतास्तपोधन-धनाः, साधु -क्रियाः साधवः। शील-प्रावरणा-गुण-प्रहरणाश् चन्द्रार्क तेजोऽधिका मोक्ष-द्वार-कपाट-पाटन भटाः, प्रीणन्तु मां साधवः ।।4।।

गुरूवः पांतु नो नित्यं ज्ञान-दर्शन-नायकाः । चारित्रार्णव-गम्भीरा, मोक्ष-मार्गोपदेशकाः 11511

इच्छामि भंते ! आयरिय भत्ति काउस्सग्गो कओ, तस्सालोचेउं, सम्मणाण-सम्मदंसण-सम्मचारित्त जुत्ताणं, पंच-विहाचाराणं आयरियाणं, आयारादिसुद-णाणोवदेसयाणं उवज्झायाणं ति-रयण-गुण-पालण-रयाणंसव्वसाहूणं, णिद्यकालं अंचेमि, पुज्जेमि, वंदामि, णमंसामि दुक्खक्खओ, कम्मक्खओ बोहिलाहो सुगइ-गमणं, समाहि मरणं, जिण-गुण-संपत्ति होउ मज्झं ।

अर्चन पुष्प समर्पयामि चरणं, चंद्रार्क तेजोऽधिका ।

गुरू पादौ मम तिष्ठ तिष्ठ हृदये, यः वर्द्धमे जीवनं ।।

विद्यासागर विश्ववंद्य श्रमणं, भक्त्या सदा संस्तुवे सर्वोचं यमिनं विनम्य परमं सर्वार्थ सिद्धी प्रदम् ।

ज्ञानाध्यान तपोभिरक्त मुनिपं, विश्वस्य विश्वाश्रयम्, सत्यं शिवं सुन्दरम् । साकारं श्रमणं विशाल हृदयं

विद्यागुरू वन्दनम् ……… II

प्रतिदिन प्रातः – संध्याकाल में जाप

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं बड़े बाबा अर्ह नमः

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आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागरजी महाराज की आरती

विद्यासागर की, गुण आगर की, शुभ मंगल दीप सजायके

आज उतारूँ आरतिया (टेक)

मल्लप्पा श्री, श्रीमति के गर्भ विषै गुरु आये।

ग्राम सदलगा  जन्म लिया है, सब जन मंगल गाये ।।

गुरुजी सब जन मंगल गाये,

ना रागी की, ना द्वेषी की, शुभ मंगल दीप सजायके ।

आज उतारूँ आरतिया ।। 1 ।।

गुरुवर पांच महा व्रतधारी, आतम ब्रह्म बिहारी।

खड्गधार शिव पथ पर चलकर, शिथिलाचार निवारी ।।

गुरुजी शिथिलाचार निवारी, गृह त्यागी की, वैरागी की,

ले दीप सुमन का थाल ही।

आज उतारूँ आरतिया ।। 2 ।।

गुरुवर आज नयन से लखकर, आलौकिक सुख पाया।

भक्ति भाव से आरती करके, फूला नहीं समाया ।।

गुरुजी फूला नहीं समाया, ऐसे मुनिवर को,

ऐसे ऋषिवर को, हो वन्दन बारम्बार हो।

आज उतारूँ आरतिया ।। 3 ।।

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मुनि श्री अजितसागरजी महाराज की आरती

हम लेकर घृत के दीप, झुकायें शीश तुम्हें मुनिराजा श्री अजितसागर जी महाराजा – 2

तुम नगर गढ़ाकोटा जन्म लियो, माँ तारादेवी को धन्य कियो श्री

कोमलचंद्रजी के हर्षे जिया अपारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

तुम विद्याअध्ययन करते हो, तुम शांत स्वभावी रहते हो

बचपन में था नाम विनोदकुमारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

तुम तीन भाई और तीन बहिन, था नहीं किसी से तुम्हें गहन

सब छोड़ दिया घरबार और परिवारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

तुमरे गुरू विद्यासागर हैं, जो ज्ञान ध्यान में उजागर हैं

तुम्हें दीक्षा देकर बहुत किया उपकारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

ऐसे गुरू विद्यासागर हैं, जो भरते खाली गागर हैं

तुमने नेमावर में भेष दिगम्बर धारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

तुम शांति सुधा बरसाते हो, हम सबके मन को भाते हो

देते प्रवचन मीठा बहुत ही प्यारा, श्री अजितसागरजी महाराजा

हम लेकर घृत के दीप, झुकायें शीश तुम्हें मुनिराजा, श्री अजितसागरजी महाराजा