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इतनी छोटी उम्र में गुरुवर

इतनी छोटी उम्र में गुरुवर

मुनिश्री अजितसागर जी महाराज की पूजन

लेखक-संतोष जैन गंजबासौदा
(तर्ज – हे गुरुवर धन्य हो तुम…)

इतनी छोटी उम्र में गुरुवर, भेष दिगम्बर धार लिया, 

क्रोध मान-अभिमान छोड़कर, समता को है वरण किया।

नहीं फंसे इस जग में स्वामी, नहिं भोगों से प्रेम किया,

बने विनोदजी से अजितसागर, हम सब पर उपकार किया ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागर मुनीन्द्र अत्र-अत्र, अवतर अवतर संवौषट् आव्हानं ।
ॐ हः मुनिश्री १०८ अजितसागर मुनीन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं ।
ॐ ह्रः मुनिश्री १०८ अजितसागर मुनीन्द्र अत्र मम् सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणं ।

ओस के सम है मेरा जीवन, पल में बनता मिटता है,

नहीं मिलता सुख चैन मुझे, मन दिन रैन तड़फता है।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

क्षीरोदधि निर्मल नीर लिये, कर्मों को धोने आये हैं ।। 1।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अग्नि जैसा मेरा जीवन, दिन रात धधकती ज्वाला है,

क्रोध कषायादि करता जो, भव दुख देने वाला है ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

मलयागिर गंध चढ़ाकर के, शीतलता पाने आये हैं ।। 2।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

यह संसार बड़ा है गुरुवर, मिलता नहीं किनारा है,

द्वार-द्वार भटका करता मैं, मिलता नहीं सहारा है ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

अक्षय निधि निज में पाने को, यह अक्षत साथ में लाये हैं ।। 3।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

मैं काम भोग में लिप्त रहा और नहीं काम को जीता है,

मायाचार अरु कपटभाव से, मेरा जीवन बीता है ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

पुष्प सा कोमल हृदय बने, यह पुष्प भेंटने आये हैं ।। 4।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

हलवा पूरी पकवान मिठाई, जन्मों से खाता आया हूँ,

नहीं भूख मिट पाई मेरी, क्षुधा से बहुत सताया हूँ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

पंचेन्द्रिय मन के षट्रस तज, अनुपम रस पीने आये हैं ।। 5।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जीवन में घोर अंधेरा है, नहीं दीप से मिला उजाला है,

मैं भूला राह गुरु अब तक, तुमसे मिला सहारा है ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

आपकी ज्ञान ज्योत से अपना, दीप जलाने आये हैं ।। 6।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

कर्मो ने मुझको घेरा है, नहीं मिलता कोई ठिकाना है,

इस राग-द्वेष मय जीवन से, मुझको मुक्ति अब पाना है।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

इस राग-द्वेष को धूप बनाकर, अग्नि में खेने आये हैं ।। 7।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

किसमिस लौंग बादाम सुपारी, गुरु चरणों में अर्पित है,

मोक्ष महाफल पाने को, ये फल चरणों में समर्पित है ।

श्री अजितसागर जी गुरुवर की, हम पूजन करने आये हैं,

परमात्म महापद मिल जाये, यही आस लगाकर आये हैं ।। 8 ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल से धुलते कर्म हमारे, चन्दन से मिलती शीतलता,

अक्षत गुरु चरणों में अर्पित, पुष्प काम को है हरता ।

चरु चढ़ाऊँ, क्षुधा नशाऊँ, ज्ञान का दीप जलाऊँ मैं,

धूप चढ़ाकर कर्म जलाऊँ, फल से मोक्ष को पाऊँ मैं ।

अष्ट द्रव्य को एक बनाकर, गुरुवर के गुण गाऊँ मैं,

भव-भव के सब पाप नशें अरहंत अवस्था पाऊँ मैं ।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्ध निर्वपामीति स्वाहा।

:: जयमाला ::

(तर्ज – ये धर्म है आतम ज्ञानी का….)

जय अजितसागर जी मुनि सुगुणखान, हम ध्यावत तुम करुणा निधान,

तुमरे पिता कोमलचन्द जान, माता तारादेवी शीलवान ।

तुम नगर गढ़ाकोटा लियो जन्म, तुम मुनि बने काटन को कर्म,

तुम तीन भाई और तीन बहिन, सब छोड़ चले किया मोक्ष गमन ।

गुरु विद्यासागर जी तुमरे जान, जो बहुत बड़े है ज्ञानवान,

जिनके हृदय है समता महान, जिनकी करुणा वात्सल्यवान ।

तुम नाम अजितसागर है संत, तुम शांत स्वभावी गुण अनंत,

तुमने समता को लिया धार, नहीं ममता से है तुम्हें प्यार ।

तुम कठिन तपस्या करत घोर, सब ममता मोह ममत्व छोड़,

गुरु तुमरे गुण हैं अनंत अपार, नहीं पाते हैं हम पार-पार ।

मैं भक्ति करूँ गुरुवर तुमरी, कट जाये मेरे कर्म सभी ।

:: दोहा ::

भाव सहित मुनिराज की, पूजा करूँ मैं आज,
भव-भव के पातक कटे, सफल होय मम काज

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये जयमाला पूर्ण अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।