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विद्यामृत बरसाने वाले

विद्यामृत बरसाने वाले

मुनिश्री अजितसागर जी महाराज की पूजन
(लेखक-ऐलकश्री विवेकानंद सागर जी महाराज)

विद्यामृत बरसाने वाले, समता भाव जगाते है,

मोह भाव को दूर भगाते, शांति सुधा बरसाते है ।

संयम तप की मूरत मुनिवर, विद्या गुरु सी सूरत है,

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से हम पूजत है ।।

ॐ ह्रः मुनिश्री 108 अजितसागर मुनीन्द्र अत्र-अत्र, अवतर-अवतर संवौषट् आवाहनं ।

ॐ ह्रः मुनिश्री 108 अजितसागर मुनीन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनं । ॐ

ॐ ह्रः मुनिश्री 108 अजितसागर मुनीन्द्र अत्र मम् सन्निहितो भव-भव वषट् सन्निधिकरणं ।

क्षीरोदधि सम नीर है निर्मल, स्वर्ण कलश में भर लाया,

जन्म मरण अरु जरा मेटने, मुनि पद में दी जलधारा ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजों स्वामी ।।1।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

भवाताप महा दुख भारी, पीडित हम सब संसारी ।

शीतल चंदन अर्पण करता, मुनि पद है मंगलकारी ।।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूों स्वामी ।।2।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय संसार ताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

शाश्वत सुख पाने हेतु, मम मन की है अभिलाषा,

अखण्ड अक्षत पुंज चढाकर, पूर्ण करो गुरु मम आशा ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजों स्वामी ।।3।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।

कल्पवृक्ष के दिव्य मनोहर, पुष्पों के लेकर आया,

काम रोग को नाशन करने, मुनि पद पूजा को लाया ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूर्जी स्वामी ।।4।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय कामबाण विनाशनाय पुष्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

भूख प्यास की पीडा से मम, तन मन भारी अकुलाये,

इसे मिटाने चरु चढाता, तप शक्ति को हम पाये ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजों स्वामी ।।5।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

इन्द्रिय सुख में भटक रहा हूँ, मोहांधकार से हो अंधित,

ज्ञान दीप मुनिवर जी दे दो, करता दीप तुम्हें अर्पित ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूों स्वामी ।।6।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

दुष्ट कर्म ये आठ हे स्वामी ! इनसे बहुत सताया हूँ,

अशुभ कर्म की धूप बनाके, आज जलाने आया हूँ ।

विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजों स्वामी ।।7।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

मोक्ष महासुख का अभिलाषी, शिव सुख साधन को पाऊँ,

पुष्प फलों को अर्पण करके, मैं मुनिपद को पाऊँ ।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजितसागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजो स्वामी ।।8।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

जल चंदन अक्षत पुष्पों का, चरु दीप को हाथ में ले,

धूप फलों से अर्घ बनाया, अनर्घ पद को पाऊँ में।

आचार्य श्री विद्यासागर के, चरण कमल मुनि अनुगामी

पूज्य अजित सागर जी मुनिवर, भक्ति से पूजों स्वामी ।।9।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अनर्घ पद प्राप्तये अर्धं निर्वपामीति स्वाहा ।

-: दोहा :-

आचार्य श्री विद्यासागर के, करता चरणों का वंदन ।

पूज्य अजित सागर मुनिवर का, करता जयमाला वर्णन ।।1।।

मुनि अजित सिन्धु चरणन में, वन्दन बारम्बार ।

रत्नत्रय साधक मुनि, गुण माला साकार ।।2।।

::- चौपाई छन्द ::-

परम दिगम्बर रुप के धारी, रहते मुनिवर नित अविकारी,

विद्या गुरु से ले आशीष, करते सारे काम सुधीश ।।1।।

माँ तारा के आँख की ज्योति, नगर गढाकोटा के मोती ।

पिता कोमल चंद जी है प्यारे, नाम विनोद कहे सब सारे ।।2।।

लौकिक शिक्षा तुमने पाई, पर लौकिकता तुम्हे न भाई ।

माता-पिता से पा संस्कार, छोड दिया तुमने संसार ।।3।।

मुनि वर क्षमा – गुप्ति का योग, हुआ नगर में वर्षा योग ।

वाणी सुनकर हुआ वैराग, छोड दिया परिजन से राग ।।4।।

ब्रह्मचर्य व्रत विद्यागुरु से, नगर ललितपुर में ले खुशी से ।

सिद्धोदय नेमावर सुन्दर, पार्श्वनाथ प्रभु मुरत मनहर ।।6।।

त्याग तपस्या करते दुर्द्धर, वाणी झरती मानो निर्झर ।

रोग परिषह सहने वाले, समता भाव जगाने वाले ।।7।।

प्रेम पूर्ण वात्सल्य अनूठा, बाल वृद्ध कोई न छूटा ।

कर्मोदय में बाधित न होते, समता धरकर उसको जीता ।।8।।

रागद्वेष के हो संहारक, आगम के संदेश प्रचारक पाप

पाप कर्म क्षय करते भारी, भव्य जीव के तुम उपकारी ।।9।।

कृपा दृष्टि मुनिवर की होवे, सब कुछ पावे दुःखी न होवें ।

हम ‘विवेक-आनंद’ को पाय, मुनि बन के कर्म नशाय ।।10।।

ॐ ह्रः मुनिश्री अजितसागर मुनीन्द्राय अनर्घ पद प्राप्तये जयमाला पूर्णअर्घ निर्वपामीति स्वाहा।

दोहा

विद्यागुरु के शिष्य की, वर्णन की जयमाल ।

अजितसिन्धु जयवन्त हो, नमन करुं मैं संभाल ।।

इति परिपुष्पाजंलि क्षिपेत्…